हमीरपुर / जनपद में राठ क्षेत्र के सिकरौधा गांव में 6 जून वर्ष 1889 को जन्मे पंडित परमानंद 16 वर्ष की उम्र से ही क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन करने लगे थे। पंडित परमानंद का मानना था कि आजादी सिर्फ सशस्त्र क्रांति से ही संभव है। पर, सवाल यह था कि हथियार कहां से लाएं। क्रांतिकारियों के दल ने यह जिम्मा पंडित परमानंद को सौंपकर उन्हें अमेरिका से शस्त्र लाने के साथ ही इंग्लैंड सरकार की सेना के गुप्त नक्शे लाने का काम भी सौंपा था। जिसके बाद वह एक जहाज में 6000 हजार राइफलें, गोले, बारूद और हथियार लेकर लौटे। और सशस्त्र क्रांति की तैयारी कर ही रहे थे कि उन्हीं के एक गद्दार साथी ने ब्रिटिश सरकार को सूचना दे दी। जिससे क्रांतिकारियों की टोली पकड़ी गई। इसमें 7 लोगों को फांसी की सजा दी गई थी। पंडित परमानंद खरे को आजीवन कारावास की सजा सुनाकर काला पानी जेल भेज दिया गया था। 1930 में हुए नमक सत्याग्रह आंदोलन में पं.परमानंद व दीवान शत्रुघ्न सिंह समेत कुल 180 स्वतंत्रता सेनानियों को जिला कारागार में निरुद्ध किया गया था। जेल के अभिलेखों के अनुसार स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पं.परमानंद कारागार के सर्किल एक व दीवान शत्रुघ्न सिंह सर्किल दो पर बंद थे।

आज स्वतंत्रता दिवस के मौके पर राठ कस्बे के लोगों ने उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। राठ कस्बे के बुधौलियाना इलाके में रहने वाले महान क्रांतिकारी पंडित परमानंद खरे जी के प्रपौत्र सदानंद खरे ने बताया कि उनका जन्म राठ क्षेत्र के सिकरौधा गांव में 6 जून वर्ष 1889 में हुआ था। बताया कि आजादी की लड़ाई के दौरान वह कई बार जेल गए। पंडित परमानंद खरे जी के हृदय में बचपन से ही देश प्रेम की भावना कूट-कूट कर भरी थी। बताया कि क्रांतिकारी पंडित परमानंद खरे ने अपना सारा जीवन देश की आजादी की जंग में लगा दिया। तथा आजादी के उपरांत उन्होंने कोई भी सरकारी पद स्वीकार न करके अपने अनूठे परित्याग का उदाहरण पेश किया। उन्होंने अंडमान निकोबार के सेल्यूलर जेल में 23 साल काले पानी की भी सजा काटी। आज भी वहां के जेल में प्रतिदिन लाइट एंड साउंड के कार्यक्रम में वीर सावरकर जी के साथ पंडित परमानंद जी के नाम का स्मरण किया जाता है। उन्होंने समूचे राठ क्षेत्र में आजादी की अलख जगा कर लोगों को स्वाधीनता का बोध कराया। सही मायने में पंडित परमानंद खरे आजादी की लड़ाई के नीव के पत्थर थे।
