बुंदेलखंड के लिए छठी अनुसूची जैसे प्रावधान की आवश्यकता
झांसी। देश के संविधान में छठी अनुसूची पूर्वोत्तर भारत के आदिवासी क्षेत्रों को विशेष अधिकार देती है। इसका उद्देश्य स्थानीय संस्कृति की रक्षा करना और संसाधनों पर स्थानीय जनता का नियंत्रण सुनिश्चित करना है। आज यही मांग बुंदेलखंड के लिए भी प्रासंगिक हो गई है।
उपेक्षा का शिकार बुंदेलखंड
बुंदेलखंड ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध क्षेत्र है। यहाँ वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई जैसी विभूतियों का इतिहास जुड़ा है, बुंदेली भाषा और लोककला की अपनी अलग पहचान है। बावजूद इसके, यह क्षेत्र हमेशा उपेक्षा का शिकार रहा है।
सिंचाई के अभाव में खेती संकटग्रस्त है।
बेरोज़गारी और गरीबी के कारण बड़ी संख्या में लोग रोज़गार के लिए पलायन कर रहे हैं।
शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है।
खनिज, बिजली और पानी जैसे संसाधनों का दोहन बाहरी कंपनियाँ करती हैं, जबकि स्थानीय जनता को लाभ नहीं मिलता।
छठी अनुसूची से सीख
पूर्वोत्तर भारत की स्वायत्त परिषदों को भूमि, वन, जल, शिक्षा, स्वास्थ्य और कराधान जैसे महत्वपूर्ण अधिकार दिए गए हैं। इससे वहाँ की जनता अपने विकास संबंधी फैसले स्वयं ले पा रही है।
बुंदेलखंड भी इसी प्रकार की व्यवस्था से लाभान्वित हो सकता है।
यदि यहाँ विशेष संवैधानिक प्रावधान किए जाएँ तो—
स्थानीय जनता को संसाधनों पर पहला अधिकार मिलेगा।
पंचायतों और जिला परिषदों को अधिक अधिकार देकर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार की दिशा में ठोस काम हो सकेगा।
बुंदेली भाषा, कला और परंपराओं की सुरक्षा सुनिश्चित होगी।
युवाओं के लिए रोज़गार और उद्यमिता के अवसर बढ़ेंगे।
अंतरिम समाधान : बुंदेलखंड परिषद
यह सर्वमान्य है कि बुंदेलखंड की स्थायी समस्या का हल केवल पृथक बुंदेलखंड राज्य के गठन से ही संभव है। किंतु जब तक यह राज्य नहीं बनता, तब तक तत्काल कदम उठाते हुए एक “बुंदेलखंड परिषद” बनाई जानी चाहिए।
इस परिषद को छठी अनुसूची की तरह ही व्यापक अधिकार दिए जाएँ—खनिज, पानी, बिजली और कृषि संसाधनों पर नियंत्रण, शिक्षा व स्वास्थ्य संबंधी नीतियों का निर्धारण, तथा कराधान और रोजगार योजनाओं का संचालन। इससे क्षेत्र की जनता को यह विश्वास मिलेगा कि उनकी आवाज़ और अधिकार सुरक्षित हैं।
क्यों है यह आवश्यक?
बुंदेलखंड का पिछड़ापन केवल आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक संकट भी है। जब लोग अपने ही संसाधनों से वंचित रहते हैं और उन्हें पलायन के लिए मजबूर होना पड़ता है, तो असंतोष और निराशा फैलती है।
यदि बुंदेलखंड को छठी अनुसूची जैसे संवैधानिक प्रावधान या अस्थायी रूप में बुंदेलखंड परिषद का गठन मिलता है, तो यह क्षेत्र अपनी क्षमता के अनुरूप विकास कर सकेगा और राष्ट्रीय एकता को और मजबूत करेगा।
निष्कर्ष
जैसे संविधान ने पूर्वोत्तर भारत की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए छठी अनुसूची बनाई, वैसे ही अब समय आ गया है कि बुंदेलखंड की भौगोलिक और सांस्कृतिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए इसे विशेष संवैधानिक दर्जा मिले। जब तक पृथक बुंदेलखंड राज्य का गठन नहीं होता, तब तक “बुंदेलखंड परिषद” का निर्माण अनिवार्य है। यही रास्ता इस संघर्षशील भूमि को न्याय, सम्मान और विकास दिला सकता है।
