झाँसी। भारतवर्ष के राजाओं में चौहान वंश के ददरेवा राजस्थान के महाराजा जाहरवीर चौहान अपनी वीरता एवं लोकप्रियता से लोक देवता के रूप में घर घर में पूजे जाते है। ददरेवा की महारानी बाछल जो कि जेवर सिंह की पत्नी थी रानी बाछल एक श्राप के कारण कई जन्मों से बाँझ होने के कारण मातृत्व सुख नहीं था। जिन्होंने महायोगी शिव अवतार गुरु गोरखनाथ जी की कठिन तपस्या की और पाताल के नाग लोक के राजा वासुकी नाग के पुत्र पदम नाग का अंश लेकर गुरु गोरखनाथ जी ने रानी बाछल को गूगल रूपी प्रसाद में दिया जिससे वीर तेजस्वी पुत्र गोगा जाहर वीर का जन्म हुआ। रानी के दयालु स्वभाव से उनकी बाँझ सेविकाओं को उस गूगल प्रसाद को बचा रानी नें दे दिया उनके साथ ही वाल्मीकि समाज के वीर रतन सिंह चावरिया, अहिरवार समाज से भज्जू सिंह, ब्रह्मण समाज से नरसिंह पांडे, और रानी बाछल की नीली घोड़ी से नीला घोड़ा नें जन्म लिया को गोगाजी बचपन से ही अपनी बाल लीलाओ के लिए प्रसिद्ध थे। बड़े होकर ददरेवा राज्य के राजा बने वाल्मीकि वीर रतन सिंह को उन्होंने अपने राज्य का सेनापति बनाया। गोगा जी समता और समानता के प्रवर्तक रहें वह सभी को एक सामान मानते थे छुआ छूत के विरोधी थे, प्रजा उन्हें अपना पिता मानती थी। सिंगल दीप की राजकुमारी श्रीयल से उनकी शादी हुई थी जो बहुत वीर थीं युद्ध कला कौशल में निपुण थीं। ग्यारहवीं शताब्दी में भारत के मंदिरों पर मुग़लों के द्वारा आक्रमण कर खज़ाना लूटना और मार काट के विरोध में गुजरात के सोमनाथ मंदिर के लुटे ख़ज़ाने को बचाते हुये गोगा जी के 47 पुत्र और साठ भतीजे वीरगति को प्राप्त हुये वाल्मीकि वीर रतन सिंह नें मुगलों से युद्ध करते हुये मातृभूमि की खातिर रणभूमि मे वीरगति पायी तो गोगा जी ने उनके पिता को सांत्वना देतें हुये कहा कि आपका बेटा रतनसिंह अमर हो गया है। इतिहास में उनका नाम सम्मान से लिया जायेगा और एक झंडा देते हुये गोगा जी श्याम लाल से बोले इसको सावन भादो में सजा कर विधि विधान से पूजन करना हम पांचो वीर एक साथ दर्शन देकर सभी की मनोकामनायें पूरी करेंगे। युद्ध के बाद गोगा जी गुरु गोरखनाथ जी के पास जाकर अपने प्रस्थान की आज्ञा लेते है और ज़मीन फटती है वह नीले घोड़े सहित धरती माता के गोद में जीवित समा जाते हैं। वाल्मीकि श्यामलाल चावरिया द्वारा उस ध्वजा को सजाया गया और पूजन किया गया जिस पर सभी वीरो ने दर्शन देकर भक्तों की मनोकामनाएं पूरी की तभी से वाल्मीकि समाज उनके निशान झंडे का पूजन करते है जिसे निशान कहाँ जाता है। झाँसी के बड़ा गांव गेट बाहर पिछोर में उनका देव स्थान बना हुआ उनके पहले गुरु गोरखनाथ जी का मंदिर गोरख टीला बना हुआ है जहाँ भादों की नवमी पर भव्य मेला वाल्मीकि समाज द्वारा लगाया जाता है। बाहर लक्ष्मी गेट राजेन्द्र भगत, विष्णु भगत, सागर गेट हरिभजन भगत, रानीमहल सुन्दर भगत, अर्जुन भगत, कुष्टयाना प्रकाश भगत, नई बस्ती कालू भगत सतीश, के निवास से भव्य रूप से महानगर के मुख्य मार्गो से ढ़ोल, बैंड, डी. जे. लगाकर गुरु गोरखनाथ और गोगा जी, रतन सिंह बाल्मीकि के जय घोष के साथ छड़ी निशान की शोभा यात्रा निकाल कर पिछोर गोगामेड़ी पर मेला में देव स्थान पूजा करते है। जहाँ हज़ारों की संख्या लोग उपस्थित रहते हैं। गोगा जी को नागो का देवता भी कहा जाता है। झाँसी में जगह जगह उनके मंदिर है जहाँ पर भगत गण उनकी जोत जला कर सम्पूर्ण रात्रि जागरण कराते है। कार्यक्रम में अतिथि के रूप में संघर्ष सेवा समिति के संस्थापक डॉ संदीप सरावगी को आमंत्रित किया गया जिन्होंने यात्रा की अगुवाई करते हुए सभी को उत्साह वर्धन किया गया डॉ संदीप के आगमन पर आयोजक मंडल द्वारा तिलक व माल्यार्पण कर उनका स्वागत किया गया। इस अवसर पर डॉ० संदीप ने कहा गोगा जी महाराज, जिन्हें जाहरवीर गोगा जी भी कहा जाता है, राजस्थान की पावन भूमि के महान योद्धा और नागवंश के आराध्य देव हैं। उन्हें “नागों के देवता” और “सर्पों के रक्षक” के रूप में पूजा जाता है। लोकमान्यता है कि सच्चे मन से गोगा जी का स्मरण करने पर सर्पदंश से मुक्ति मिलती है और जीवन में साहस, संरक्षण व समृद्धि प्राप्त होती है। गोगा जी केवल नागों के देव ही नहीं, बल्कि धर्म, सत्य और न्याय के प्रतीक भी हैं। उन्होंने अपने जीवन में अन्याय और अधर्म के विरुद्ध संघर्ष किया और समाज को यह संदेश दिया कि हमें हमेशा सत्य और धर्म के पथ पर चलना चाहिए।
