दैनिक बुन्देलखण्ड बुलेटिन
झांसी – उत्तर प्रदेश के झांसी जिले की मोठ तहसील के दैगुंवा गांव में एक छोटी सी चिंगारी ने ऐसा कहर बरसाया कि लोगों की ज़िंदगियाँ राख में बदल गईं। तेज़ आंधी और बारिश के बीच अचानक लगी आग ने 8 से 10 घरों को अपनी चपेट में ले लिया। अब न घर है, न राशन, न कपड़े, न ही किसी छत की छाया… और जिम्मेदार अधिकारी? वही रटी-रटाई लकीर—आश्वासन, और फिर रवाना! दैगुंवा गांव में अचानक उठी चिंगारी ने कुछ ही पलों में कई परिवारों की पूरी ज़िंदगी को जला डाला। घरों में रखा सारा सामान, बच्चों के कपड़े, बुज़ुर्गों की दवाइयाँ, और यहां तक कि एक बेटी के सपनों का सुहाग का जोड़ा भी आग की भेंट चढ़ गया। शादी की तारीख़ तय थी…और अब सिर्फ़ राख बची है। जिस घर में कुछ ही दिनों में शहनाई बजनी थीं, वहां अब सिर्फ़ सन्नाटा है। उस बेटी की आँखों में अब सपनों की चमक नहीं, जल चुके अरमानों की राख है। उसकी मां चीख रही है… “हमने बेटी के लिए जोड़-तोड़कर सपने सजाए थे… अब क्या दें उसे?” जिम्मेदार अधिकारी कह रहे है मुआवज़ा उनके अकाउंट में ट्रांसफर कर दिया जाएगा।”
भूख से तड़पते बच्चे, नंगे तन, सिर पर छत नहीं… लेकिन प्रशासन के पास राहत नहीं, बस बयान है। जब पीड़ा हद से गुज़र गई, तो ग्रामीणों ने शाहपुर बस स्टैंड को जाम कर दिया। पुलिस आई, और वही किया जो वो करती है—बल प्रयोग। लेकिन ग्रामीण झुके नहीं। उनके कदम अब मोठ तहसील की चौखट तक पहुँच चुके हैं। “साहब, 24 घंटे से भूखे हैं बच्चे, पानी भी नहीं है, छत भी नहीं बची… अब क्या करें? मासूम बच्चों की आंखों में अब सिर्फ़ एक आस है—दो निवाले की। वो भूख से रोते हैं, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं। अधिकारी आते हैं, घूमेंगे, दिखावा करेंगे और फिर उसी रट के साथ चले जाएंगे—“मुआवज़ा मिलेगा।” क्या मुआवज़ा भूख मिटा सकता है? क्या बैंक अकाउंट से निकाले गए रुपयों से जल चुकी जिंदगी लौटाई जा सकती है? क्या एक बेटी की शादी फिर से सजी-संवरी लौट सकती, सवाल कई है, लेकिन जवाब जिम्मेदारों के पास कुछ नहीं।
