चौरासी लाख योनियों में मनुष्य की योनि सर्वश्रेष्ठ है: रामशरण दास जी महाराज

रिपोर्ट -शौकीन खान/कौशल किशोर गुरसरांय

गुरसरांय (झांसी)।चौरासी लाख योनियों में मनुष्य की योनि सबसे श्रेष्ठ है,अगर मनुष्य इस योनि में जन्म लेकर भगवत भक्ति से दूर रहकर सिर्फ खाने कमाने में लगा रहा तो उसका जीवन व्यस्त चला जाएगा और उसे जीवन मरण के चक्र से छुटकारा नहीं मिलेगा। उक्त आशय के उद्गगार अयोध्या धाम से आए संत रामशरण दास जी महाराज ने व्यक्त किए। वे आज नगर के पटकाना मोहल्ले में स्थित श्री दास हनुमान जी मंदिर प्रांगण में श्री बजरंग मानस प्रचारिणी समिति के तत्वावधान मैं आयोजित 42वें श्रीरामचरितमानस सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। श्री रामचरित मानस सम्मेलन की द्वितीय दिवस की कथा के दौरान मानव जीवन सार्थकता का वर्णन करते हुए उन्होंने बताया कि जीवात्मा को बड़े भाग्य से मनुष्य की देह प्राप्त होती है इसलिए मनुष्य का धर्म है की वह अपना जीवन सदकार्यों एवं भगवत भक्ति में लगा कर मानव जीवन को सार्थक करें। आगे उन्होंने कहा कि मनुष्य जब ईश्वर से विमुख होकर अधर्म के रास्ते पर चला जाता है तो उसका वैभव यश कीर्ति और धन संपदा पाई पाई से उसका साथ छोड़ कर चली जाती है और वह कंगाली के दलदल में फंस जाता है। इसके बाद अयोध्या धाम से आई साध्वी मांडवी अनुचरी ने अपनी कथा के दौरान मानव के जीवन विभिन्न पहलुओं को रेखांकित करती रामचरितमानस के कई रोचक प्रसंगों की चर्चा की इस मौके पर उन्होंने अपने प्रवचन में बताया कि सत्संग सुनने के लिए देवता भी तरसते हैं, उन्होंने कहा कि वेद पुराण समुद्र हैं इसमें सब कुछ भरा हुआ है। जैसे समुद्र के दो किनारे होते हैं उसी प्रकार संसार सागर के भी दो किनारे होते हैं। समुद्र में विष और अमृत दोनों हैं इसी प्रकार संसार सागर में सुख और दुख दोनों हैं। और यह हमें तय करना है कि हमें विष का पान करना है या अमृत का। इसके उपरांत राम कृपाल दास जी महाराज और अयोध्या प्रसाद पाठक ने भी बड़े ही मार्मिक ढंग से राम कथा का वर्णन किया। कार्यक्रम का संचालन रानू तिवारी छिरौरा ने किया।

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